Tuesday, September 1, 2009

१२ नवम्बर

दुनिया का चाँद सदियों से है आसमां पर
मेरा चाँद इस रोज़ उतरा था यहाँ पर
इक नूर रोशन है उससे मेरे जहाँ में
पर इक फासला भी है दोनों के दरमियाँ में
हम दोनों रहे हैं जुदा ही सदा से
यही इल्तजा है मेरी उस खुदा से
उसे चाहता हूँ कितना ये उसको बता दे
मेरा नगमा-ऐ-सौगात उसको सुना दे

6 comments:

  1. badhia rachna.

    ब्लॉग जगत में स्वागत है.

    swapnyogeshverma.blogspot.com
    swapnyogesh.blogspot.com

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  2. यही इल्तजा है मेरी उस खुदा से
    उसे चाहता हूँ कितना ये उसको बता दे..bahut sunder likha aapne..

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  3. बहुत अच्छे भाव हैं जी

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  4. आपने बहुत अच्छी कविता लिखी है।

    http://sanjay.bhaskar.blogspot.com

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